गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि मुक्त आत्मा के व्यक्ति बिना
किसी स्वार्थ पूर्ति की कामना से कर्म करके जीवन में उत्कर्षतम स्थिति को पाता है
क्योंकि बिना आसक्ति के किया हुआ कर्म ही सर्वोपरि गुणवत्ता का होता है ।
व्याख्याकार इस कथन की व्याख्या करते हुये बताता है कि यज्ञ को समर्पित कर्म की
अपेक्षा मुक्त आत्मा द्वारा किया हुआ कर्म उत्कृष्ठ होता है । पुन: इच्छापूर्ति
में किये गये कर्म की अपेक्षा यज्ञ में आहुति के रूप में किया हुआ कर्म उत्तम होता
है । इसलिये मुक्त आत्मा के कर्मको सर्वोपरि गुणवत्ता का कहा गया है । दूसरे रूप
में उत्तम कर्मविधि से किया हुआ कर्म मुक्ति प्रशस्थ करता है । इस प्रकार कर्म ही मुक्ति प्रदान भी
करता है ।
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