गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति इच्छाओं को
पकड कर निचोडता है अर्थात् उनकी पूर्ति कर के इंद्रीय वासनाओं की पूर्ति करना
चाहता है तो उस व्यक्ति को यथार्त में अ-शांति ही मिलती है । उपरोक्त के विपरीत एक
व्यक्ति जो अपने को इच्छाओं के प्रति समुंद्र के समान शांत बनाता है, अर्थात्
इच्छायें शांत समुंद्र में गिरने वाली नदियों के समान उसमें आकर गिरती हैं और उस
समुंद्र में समा जाती हैं और समुंद्र का जल स्तर अपरिवर्तित रहता है, ऐसा
व्यक्ति शांत ही बना रहता है, इच्छाये उसे
अशांत नहीं कर पाती हैं ।
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