गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि बुद्धियोग की स्थिति प्राप्त व्यक्ति
इंद्रियों की वासना वस्तुओं के मध्य विचरण करते हैं परंतु फिरभी उनके विवेक की
शाश्वतता प्रभावित नहीं होती है । ऐसे व्यक्ति के सम्मुख जो भी परिस्थिति जिसभी
रूप में आती है वे उसे बिना किसी प्रतिक्रिया के उसके मौलिक स्वरूप में ग्रहण करते
हैं । ऐसे व्यक्ति को किसी दूसरे की अमानत की कोई चाहत नहीं होती है,
किसी के वैभव से कोई ईर्ष्या नहीं होती, उनकी अपनी कोई इच्छा नहीं होति और ना
ही कोई माँग होती है । ऐसी शुद्धआत्मा के व्यक्ति को दु:ख की छाया भी नहीं छूती है
। ऐसे व्यक्ति परमात्मा के साथ सीधे सम्पर्क में रहते हैं ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें