गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि निष्कर्म कर्म करने की वह स्थिति है
जिसमें मनुष्य कर्म द्वारा प्रभावित नहीं होता है । प्रकृति का नियम है कि मनुष्य
कर्म के फल से बँधता है । प्रत्येक कर्म की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है फलत:
सृजित होता है बंधन, आत्मा को पुनर्जन्म के लिये आधार तथा
परम् सत्य का ज्ञान पाने में बाधा बढती है । इन दोषों से बचने के लिये कर्म का
त्याग नहीं अपितु कर्म फल के त्याग की आवश्यकता होती है । निष्कर्म कर्म करना वाँक्षित
होता है ।
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