गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

अंतर्मुखी और बाह्यमुखी

अर्जुन द्वारा व्यक्त किये गये मानसिक भ्रम का निवारण करने के लिये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण उसे बताये कि ज्ञान प्राप्ति के जिज्ञासु प्राय: दो प्रकार के होते हैं (1) वे व्यक्ति जो ज्ञान के उपदेश को अपने मस्तिष्क में ध्यानके बल से ग्रहण करते हैं (2) वे कर्मशील जिज्ञासु जो उपदेश को बाह्य जगत में कर्म के माध्यम से उसे ग्रहण करते हैं । जिन्हे अपने मस्तिष्क में ध्यान के द्वारा ग्रहण करने की रूचि है उनके लिये बुद्धियोग उपयोगी होता है और जिन्हे कर्म द्वारा ज्ञान ग्रहण करने में रूचि है उनके लिये कर्मयोग उपयोगी होता है । दोनो ही पथ बराबर प्रभावी होते  है । 

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