गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि अ-नियंत्रित विवेक धारक व्यक्ति का
मस्तिष्क कभी एकाग्र नहीं हो सकता है । एकाग्रता के अभाव से वह सदैव अशांत दशा में
रहेगा । मस्तिष्क जब विभिन्न इंद्रियों के विषयों के पीछे भ्रमण करेगा तो उसका
विवेक कभी भी उसके हित में सहायक नहीं हो सकेगा । जिस प्रकार पानी पर तैरती नाव को
हवा चलाती है उसी प्रकार उसकी इंद्रियाँ उसे कभी स्थिर नहीं होने देंगी । इसलिये
हे अर्जुन जब तक मनुष्य अपने को इंद्रीय वासनाओं से समेटेगा नहीं तब तक उसका विवेक
एकाग्र नही हो सकता ।
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