गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को यज्ञ का स्वरूप बताने के लिये कहते हैं कि मनुष्य और
यज्ञ रूपी प्रकृति दोनो परस्पर एक दूसरे को देते हैं । यह परस्पर आदान प्रदान यज्ञ
है । एक व्यक्ति के रूप में मनुष्य और यज्ञ के रूप में संसार दोनो एक दूसरे के
सहयोग के ऊपर निर्भर हैं । मनुष्य कर्म की आहुति यज्ञ को अर्पित करता है । यज्ञ
रूपी प्रकृति इस आहुति से प्रसन्न होती है । यही जीवन का नियम है । कर्म भी ब्रम्ह
है,
आहुति भी ब्रम्ह है, आहुति देने वाला भी ब्रम्ह है,
आहुति पाने वाला भी ब्रम्ह है, लक्ष्य भी ब्रम्ह है,
वस्तु भी ब्रम्ह है । यज्ञ में सभी कुछ ब्रम्ह है ।
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