गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म की उत्पत्ति बताते हुये कहे कि कर्म जो कि यज्ञ
की प्रकृति है की उत्पत्ति अक्षर ब्रम्ह से है । इस प्रकार ब्रम्ह जो समस्त रूपों
में व्याप्त है यज्ञ के केंद्र में विद्यमान रहता है । व्याख्याकार गुरू के
उपरोक्त कथन की पुष्टि में ऋग वेद का अंश उद्घृत करके बताता है कि एक पुरुष को
यज्ञ को आहुत किया जिसका विस्तार समस्त आकाश में विस्तरित था । इस महान यज्ञ की
आहुति से सृष्टि का रूप स्थिर है । यज्ञ रूपी प्रकृति की उत्पत्ति भी ब्रम्ह से है,
यज्ञ भी ब्रम्ह है, आहुति भी ब्रम्ह ही है ।
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