व्यक्ति अपनी शरीर के बाह्य आवरण से भिज्ञ होता है । व्यक्ति
अपनी आत्मा की उपस्थिति से अनभिज्ञ होता है । जबकि व्यक्ति के जीवन का आधार वह
आत्मा ही है । जबतक व्यक्ति उस आत्मा से अनभिज्ञ है प्रकृतीय मोंह ही उसका परिचय
बना हुआ है । आत्मा को जानने मात्र से प्रकृतीय मोंह क्षीण होने लगता है । मोंह से
मुक्ति ही प्रशस्थ करना गुरू के उपदेश का लक्ष्य है ।
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