अहंकार निम्नतर आठ वर्गीय प्रकृति का एक अंग होता है । यह
कर्मफल के नियम के प्रभाव से जागृत दशा धारण करता है । इसी के प्रभावी होने के फल
से आत्मा बारम्बार रूप प्रकृति में जन्म लेने को बाध्य होती है । आत्मा रूपों में
स्थापना काल में अपने कर्मों की स्वयं स्वामी नहीं रह जाती है । वह निम्नतर
प्रकृति के वर्चस्व को स्वीकारने को बाध्य होती है ।
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