यदि इस संसार की उत्पत्ति के कारण की खोज़ की जाय तो कोई तर्क
संगत उत्तर नहीं मिलता है । यदि इसे ब्रम्ह के मनोरंजन के निमित्त कहा जाय तो
ब्रम्ह तो भोक्ता होता नहीं मात्र दृष्टा होता है । यदि इसे रूपों के मोक्ष का
अवसर माना जाय तो समस्त सृजन स्वयं ही मोंह का पथ है, मोक्ष विरोधी है । इस प्रकार न ही प्रश्न और न ही उत्तर ही
तुष्टिकारक हैं । यह ब्रम्ह की माया है कि समस्त रूप संसार अपने इस रूप में हैं । यही
एक मात्र तुष्टिकारक उत्तर है ।
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