आत्मा प्रकृतीय मोंह से अपने को बचा नहीं पाती है । कार्यों को
प्रकृतीय गुणों के अधीन करती है । इसलिये वह कर्मफल से बंधती है । पुनर्जन्म के
लिये बाध्य होती है । यह उसके लिये असहाय स्थिति होती है । इस स्थिति से उबरने का
एक ही उपाय होता है । अज्ञान से उबरना । प्रकृतीय मोंह से उबरना । प्रकृतीय गुणों
के अधीन कार्य करने का अभ्यास त्यागना ।
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