गुरू सत्य का रहस्य अनुभव कराने के लिये पहले सत्य के विषय में
बताया, फिर बताया कि जो व्यक्ति मोंह
ग्रसित होते हैं वे सत्य के ज्ञान के प्रति जिज्ञासु नहीं होते हैं, और अब तीसरे चरण में बताते हैं कि जो
व्यक्ति क्रूर क्रियाँओं में सम्मलित होते हैं उनके कर्म के प्रति सारे प्रयत्न
व्यर्थ जाते हैं । यह क्रमिक अवस्थायें हैं । ज्ञान के जिज्ञासु । ज्ञान के प्रति
अचेत । ज्ञान के विपरीत भ्रष्ट आचरणी ।
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