गुरू का कहना है कि जब तक हम अपनी आत्मा से अनभिज्ञ हैं तब तक
मानो हम अंधकार में जीवन जी रहे हैं । आत्मा को जानने और उसकी मर्यादा के अनुरूप जीवन
को पर्णित करने में जीवन की सार्थकता निहित होती है । जब तक हम ऐसा नहीं कर सकेंगे
तब तक हम प्रकृतीय मोंह के भ्रमात्मक जीवन में भटकते रहेंगे ।
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