ब्रम्ह यद्यपि कि प्रभव व प्रलय का नियंत्रक होता है परंतु
फिरभी वह इन कार्यों का कर्ता नहीं होता है । कर्म करने में कर्तापन का भाव ही
कर्म के प्रतिफल अर्थात् बंधन का कारण बनता है । ब्रम्ह प्रकृति के कार्यों को
सम्पादित करा देता है परंतु कर्ता नहीं होता है । इसलिये बंधन से मुक्त होता है । यही
अनुकरणीय है । मुक्ति का पथ है ।
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