गुरू का उपदेश है कि व्यक्ति को अपना प्रत्येक कार्य ब्रम्ह को
अर्पित करके करने से उसका प्रत्येक कर्म शाश्वत सेवा में पर्णित हो जाता है । यह
अहंकार के नाश में सहायक होता है । आत्मा प्रधान व्यक्तित्व के जिज्ञासु को यह किये
जा रहे प्रयत्नों के लिये अत्यंत योगकारक दशा होती है ।
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