गुरू ने ब्रम्ह के रहस्य का जो विस्तार बताया है इससे यह बिलकुल
साफ स्पष्ट विदित है कि निराकार ब्रम्ह की किसी रूप विषेस में कल्पना निराधार है ।
फिरभी उपासक को समझने के लिये किसी रूप का सहारा लेना पडता है । इसी कारण अनेकानेक
देवरूपों का प्रचलन सम्भव हुआ है ।
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