कर्म को ब्रम्ह को अर्पित करके करना ज्ञोतक होगा कर्म को ब्रम्ह
की सेवा के लिये करना । स्मरणीय है कि कर्म को अपनी इच्छा की पूर्ति के लिये करना
वर्जित कहा गया है । प्रत्येक कर्म को ब्रम्ह को अर्पित करके करना उस कर्म को
ब्रम्ह की सेवा के पवित्र स्वरूप में पर्णित करना है । यह कर्मयोग का पोषक भाव है
। ऐसा करने से व्यक्ति के जीवन का प्रत्येक पल ब्रम्ह की सेवा में पर्णित हो
जायेगा ।
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