निम्नतर प्रकृति को उत्थान द्वारा उच्चतर प्रकृति के धर्म के
अनुरूप बनाने का प्रयत्न वास्तविकता में मनुष्य योनि के जन्म में ही सम्भव होता है
। मनुष्य शरीर की प्राप्ति का सही उपयोग इसी लक्ष्य की प्राप्ति में ही निहित होता
है । यह उपलब्धि किसी भी अन्य योनि के जन्म में सम्भव नहीं होती है । गुरू का समस्त
उपदेश इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिये है ।
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