सांसारिक जीवन में सांसारिक द्वैतो का भोग ही समस्त त्रासदा का
मूल होता है । इसलिये जो व्यक्ति सांसारिक वैभवों को लक्ष्य कर देवताओं की उपासना
करते हैं और लक्षित वैभव पाते भी हैं तो भी उन्हे इन सांसारिक द्वैतो से तो मुक्ति
मिलती नहीं है । इसके विपरीत जो व्यक्ति आत्मा प्रधान जीवन को लक्ष्य कर अपने
समस्त कर्मों को ब्रम्ह को अर्पित करता है वह सांसारिक द्वैतों से मुक्त ब्रम्ह की
दिव्य शांति को पाता है ।
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