कर्म कोई भी किया जाय उसे कंचिद ब्रम्ह की सेवा के भाव में
पर्णित करके किया जाय तो वह कर्म सम्पादन ही ब्रम्ह की पूजा में पर्णित हो जायेगा
। फिर व्यक्ति को ब्रम्ह की पूजा के लिये अलग से कोई धार्मिक कर्म करने की
आवश्यकता नहीं रह जायेगी । समस्त कर्मों का कर्ता ब्रम्ह स्वयं है । हम सेवक
ब्रम्ह के कर्म को करके ब्रम्ह की सेवा ही करते है ।
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