गुरुवार, 16 जून 2016

भोक्ता स्वरूप

गुरू ने ब्रम्ह को समस्त कार्य आहुतियों का भोक्ता होने का उपदेश दिया है । कार्य सम्पादन ब्रम्ह की प्रकृति है । प्रकृति का उद्भव श्रोत में विलय । यह मौलिक स्वाभाविक सत्य है । ब्रम्ह से ही प्रकृति का उद्भव भी है । समस्त कार्य प्रकृति के सम्पादन है । इसका विलय भी ब्रम्ह में ही है । इस चक्र की ग्राह्यता ब्रम्ह के सत्य स्वरूप का बोध कराने वाली है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें