कर्म को ब्रम्ह की सेवामें अर्पित करके करने की विधि बताने के
उपरांत गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से इस अर्पण का विज्ञान बताते हुये कहे कि
इस प्रकार तुम कर्म के फल के विकार से बच जावोगे और तुम सन्यास के भाव में कर्म को
करते हुये मुझे प्राप्त कर सकोगे ।
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