गुरू ने ब्रम्ह के व्यापक स्वरूप का जितना भी वृतांत बताया उनसे
ब्रम्ह की धारणा स्थिर करना प्रथम लक्ष्य बनता है । यह धारणा प्रत्येक व्यक्ति
अपनी श्रद्धा और अनुभव के अनुसार धारण करता है । चित्रकार चित्रो के माध्यमसे
व्यक्त करने की चेष्टा करता है, कवि अपने काव्य के माध्यम से
व्यक्त करनेकी चेष्टा करता है । इसी प्रकार भक्त अपनी श्रद्धा के अनुरूप धारण करता
है ।
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