सोमवार, 13 जून 2016

ब्रम्ह एक दूसरा नहीं

गुरू का उपदेश है कि ब्रम्ह एक ही है । उसका कोई दूसरा रूपांतर नहीं है । मात्र उस ब्रम्ह की धारणा कैसे अपने हृदय में स्थापित कर सकता है व्यक्ति उसके लिये वही रूप ग्राह्य बन जाता है । गुरू इसी बात की पुष्टि में कहे कि जो मुझे जिस रूप में पूजता है मैं उसे उसी रूप के माध्यम से फल देकर उसकी पूजा को सफल करता हूँ । 

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