शनिवार, 11 जून 2016

कोई भिन्न देवता नहीं

गुरू का उपदेश विदित करता है कि ब्रम्ह का विस्तार ही समस्त रूप संसार है । हम जिसे भिन्न देवता समझ कर पूजते वह भी ब्रम्ह ही होता है । यह मात्र पूजने वाले की सीमित बुद्धि है कि वह अपने आराध्य को एक भिन्न देवता मानता है । 

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