भगवद्गीता
मंगलवार, 23 अगस्त 2016
दान
बिना किसी प्रत्यावर्तन की कामना किये किसी असमर्थ की सहायता में दिया गया वस्तु अथवा श्रम दान होता है । यह भी प्रकृतीय गुणों की परिधि में आता है मात्र सात्विक होने के कारण अन्य गुणों के सापेक्ष शिरोमणि है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें