व्यक्ति उपस्थित होने वाली स्थितियों को अपने मस्तिष्क में
व्याप्त इच्छाओं के आलोक में ही ग्रहण करता है । उपस्थित हुई स्थितियाँ सत्य रूप
में क्या परिलक्षित कर रहीं हैं अथवा किस कर्म की अपेक्षा व्यक्त कर रही हैं इसका
सहीं मूल्याँकन करना सत्य को ग्रहण करना है ।
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