भगवद्गीता
शनिवार, 20 अगस्त 2016
समता का भाव
प्रत्येक जीव का उद्भव ब्रम्ह से है । प्रत्येक गति का प्रेरक स्वयँ ब्रम्ह है । इन भावों का हृदयस्थ होने से समता के भाव का जन्म होता है । यह अनुभूति होने की स्थित है । यह मात्र शिक्षा से ग्रहण नही हो सकती है ।
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