व्यक्ति अपने इच्छाओं की पूर्ति में अर्जित करके संचित किये
हुये सुख साधनों की रक्षा करना चाहता है । इन्हीं संचित और रक्षित सुख शाधनों के
क्षय की आशंका और सम्भावना उसके मस्तिष्क में भय उत्पन्न करते है । एक मानसिक
वेदना जिसका जन्म किसी सम्भावित क्षति के चिंतन से सृजित होती है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें