ज्ञान के जिज्ञासु को,
बाह्य इंद्रीय वासनायें जिनमें सम्मलित होने से आत्मा प्रकृतीय मोंह में आसक्ति
जनित करती है, से बचने का गुरू ने उपदेश किया है
। आत्मा को ऐसी वृत्तियों से रोकना अपेक्षित बताया गया है । भगवद्गीता के ग्रंथकार
ने इसे दम शब्द द्वारा व्यक्त किया है ।
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