अन-अपेक्षित कार्यों में सम्मलित होने से व्यक्ति पापकृतों का
कर्ता बनता है । इसे गुरू वर्जित बताये हैं । आत्मा की इस वृत्ति पर अंकुश करना
नियंत्रण है । नियंत्रण को दो भागो में विभाजित करके अपनाने से प्रभावी परिणाम
मिलते हैं । यह विभाजन जनित होने वाले फल के प्रभाव स्थल बाह्य अथवा आंतरिक पर
आधारित किया जाना चाहिये ।
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