प्रकृति ने जो कुछ दिया उसमें संतुष्ट रहना यह संतोष है । कर्म
करने में कर्म का कोई निमित्त होता है । यदि कर्म इच्छाजनित है तो फल की आकाँक्षा
होगी । फिर एक निश्चित मनोवाँक्षित फल की दशा में ही व्यक्ति संतुष्ट होगा ।
अन्यथा संतुष्ट नहीं होगा । सन्यासी का कर्म है तो प्रत्येक फल में वह व्यक्ति
संतुष्ट रहेगा । इसलिये कर्म करने का भाव के लिये संतोष एक निश्चयात्मक लक्षण है ।
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