रविवार, 14 अगस्त 2016

सुखांभूति दु:खांभूति

प्रकृतीय गुणो की भोक्ता आत्मा होती है । जब तक वह इच्छाजनित कर्मों का पोषण करेगी तब तक वह इच्छानुकूल कर्मफल से सुख की अनुभूति करेगी तथा इच्छा के प्रतिकूल कर्मफल से दु:ख की अनुभूति करेगी । गुरू ने ज्ञान के जिज्ञासु के लिये इन दोनो ही अनुभूतियाँ को वर्जित बताया है । इन्ही कारणों इनके जनित होने के श्रोत इच्छाजनित कर्मों के पोषण” को वर्जित बताया गया है । 

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