प्रकृतीय गुणो की भोक्ता आत्मा होती है । जब तक वह इच्छाजनित
कर्मों का पोषण करेगी तब तक वह इच्छानुकूल कर्मफल से सुख की अनुभूति करेगी तथा
इच्छा के प्रतिकूल कर्मफल से दु:ख की अनुभूति करेगी । गुरू ने ज्ञान के जिज्ञासु
के लिये इन दोनो ही अनुभूतियाँ को वर्जित बताया है । इन्ही कारणों इनके जनित होने
के श्रोत ‘इच्छाजनित कर्मों के पोषण” को
वर्जित बताया गया है ।
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