भगवद्गीता
गुरुवार, 18 अगस्त 2016
भय से मुक्ति
अर्जित किये हुये सुख सामग्रियों के संचय की वृत्ति यदि कंचिद क्षीण हो जाय तो व्यक्ति निर्भय स्थिति का भोग करेगा । भय से मुक्त स्थिति होगी । भय एक मानसिक वेदना की अनुभूति होती है । इसलिये पुष्ट मानसिक दशा भय-मुक्ति को पोषित करने वाली होगी ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें