शनिवार, 13 अगस्त 2016

साम

आत्मा को अन-अपेक्षित कर्मो के प्रेरण में सम्मलित होने के प्रति सहज़ अरुचि के अभ्यास को सृजित करना आत्मा की वृत्तियों को नियंत्रित करना है । इस प्रक्रिया को भगवद्गीता के ग्रंथकार ने साम शब्द द्वारा व्यक्त किया है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें