गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस व्यक्ति को
मेरे इस फैले हुये रूप संसार रूपी वैभव का ज्ञान हो जाता है और वह इस समस्त फैले हुये वैभव के
उद्गम श्रोत के रूप में मुझे जानता है वह व्यक्ति अविचलित ध्यान द्वारा मुझमें
युक्त दशा में ही रहता है ।
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