ब्रम्ह इस रूप संसार के उद्भव का मूल है ।
वह इस रूप संसार में प्रतिपल घटित हो रही प्रत्येक गति का संचालक है । परंतु
उपरोक्त सत्यो के होते हुये भी वह स्वयं ना ही किसी रूप में है और ना ही किसी गति
में वह सम्मलित है । उस ब्रम्ह की प्रतिनिधि उसकी उच्चतर प्रकृति आत्मा का भी यही
मौलिक स्वरूप होता है । परंतु प्रकृतीय संसर्ग के फल से आत्मा प्रकृतीय मोंह में
आसक्त हो जाती है । फलत: अपने मौलिक स्वरूप को विस्मृत कर बैठती है । यदि कंचिद
गुरू के उपदेश के फलसे और तत्फलम् उसके अनुसरण से व्यक्ति प्रकृतीय मोंह से मुक्त
हो जाय तो फलत: उसकी आत्मा अज्ञान से मुक्त हो जाय अर्थात अपने मौलिक स्वरूप में
स्थापित हो जाय तो वह ब्रम्ह की अनुभूति के लिये योग्य पात्र बन जाय । वही व्यक्ति
अवतारी पुरुष बन जाय । अवतार स्वरूप यही है । ब्रम्ह चेतना जागृत दशा में विद्यमान
रहना ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें