एक पात्र में जल है । उस पात्र को पूर्ण रूप
से बंद करके जल में डुबाकर रखा गया है । ऐसी दशा में पात्र के अंदर भी जल है और
पात्र के बाहर भी जल है । पात्र के अंदर के जल और बाहर के जल के मध्य यह पात्र ही
विभाजन है । कंचिद यदि पात्र को भी जल में पर्णित होने की कल्पना की जाय तो ऐसी
दशा में अंदर का जल और बाहर का जल सब एक रूप हो जायेगा । गुरू ने बुद्धियोग द्वारा
ज्ञान के जिज्ञासु को यही स्थिति प्राप्त करने का पथ बताया हैं ।
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