चरण 1 से क्रमश: । अर्जुन बोला हे
परम् ब्रम्ह, हे परम् धाम, हे सर्वोच्च सत्य स्वरूप, हे पवित्र, हे देवपुरूष,
हे सर्वोच्च देव, हे अजन्मे, हे सर्वव्यापी ब्रम्ह । व्याख्या - जिज्ञासाओं को गुरू के
सम्मुख व्यक्त करने के लिये सबसे पहले तो अर्जुन को गुरू की मर्यादा के अनुरूप
उचित शब्दों की आवश्यकता थी । इस अपेक्षा की पूर्ति में वह गुरू के लिये उन सभी
सम्मानित शब्दों का प्रयोग करता है जिनका उसे ज्ञान था यथा परम् ब्रम्ह, परम् धाम आदि ।
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