ब्रम्ह की विभूतियाँ तो सामने दृष्य है । समस्त प्रत्येक विभूति ब्रम्ह से
सम्भव हुई है यह अनुभूति ग्रहण करना अपेक्षित होता है । गुरू ब्रम्ह का रहस्य
बताते हुये प्रारम्भ से ही इसी अनुभूति को कराने के लिये चेष्टारत हैं । यह भगवद्गीता
का केंद्रीय आदर्श है कि साधक जिज्ञासु स्वयं अपनी अनुभूति द्वारा ब्रम्ह को जाने
।
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