गुरू का उपदेश है कि जो व्यक्ति ब्रम्ह के सही स्वरूप की धारणा
मस्तिष्क में स्थिर करके ब्रम्ह ज्ञान को उन्मुख होता है वह स्वाभाविक रूप से उसी
ब्रम्ह की सदैव चर्चा करता है, उसी ब्रम्ह की सदैव महिमा गाता है, उसी ब्रम्ह का ही सदैव चिंतन करता है, उसी ब्रम्ह का सदैव ध्यान करता है और सदैव उस
ब्रम्ह को ही समर्पित रहता है ।
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