ब्रम्ह की अभिव्यक्ति करने के लिये, “अनिर्देष्यम्” जिसकी परिभाषा नहीं की जा सकती, “अव्यक्त अक्षरम्” जिसका कोई रूप नहीं है और जिसका
क्षय नहीं होता है,
“अचिंत्यरूपम्” जिसका चिंतन करना सम्भव नहीं है, जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है ।
फिरभी उसकी ग्राह्यता के लिये गुरू पथ निर्दिष्ट किये है ।
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