आत्मा प्रधान जीवन के जिज्ञासु
अर्जुन गुरू द्वारा अब तक बताये गये ब्रम्ह के व्यापक रहस्य को सुनकर बिलकुल
हतप्रद दशा को प्राप्त हो गया है और ऐसी मन:दशा में अपनी जिज्ञासा को व्यक्त करते
हुये कहता है कि हे प्रभू मैं यह अनुभव कर रहा हूँ कि इस समस्त रूप संसार का उदय
आप से ही हुआ है और यदि कंचिद प्रत्येक रूप अपनी पूर्णता की स्थिति को प्राप्त कर
सके तो वे सभी रूप आप सदृष्य हो जायेंगे । व्याख्या - ब्रम्ह के व्यापक रहस्य को
सुनकर अर्जुन रोमांचित हो उठा है । उसने गुरू के मुख से जो कुछ भी सुना है उसे
लगता है कि यह सब सच तो है परंतु उसका तार्किक विवेक यह नहीं ग्रहण कर पा रहा है कि
यह सब सच कैसे है । इस जिज्ञासा की शांति के लिये वह गुरू से निवेदन करता है
।
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