श्रीमद भगवद्गीता में अव्यक्तनीय
सत्य ब्रम्ह और उसकी अपर्याप्त अभिव्यक्ति इस रूप संसार में कोई विरोधाभास जैसी
स्थिति नहीं व्यक्त की गई है । यह सत्य है कि ब्रम्ह को मनुष्य की ज्ञानेंद्रियों
की ग्राह्यता के परे का अस्तित्व बताया गया है परंतु फिरभी उस एकाकी सत्यब्रम्ह को
उसकी रचनाओं के माध्यम से जाना जा सकता है, अनुभव किया जा सकता है, उसे पूजा जा सकता है । यह सभी कुछ सम्भव है ।
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