इस लेख श्रंखला के विगत तीन अंक
जिनके शीर्षक “निमित्तमात्र”, “कर्म विवेक” और “निमित्तमात्रम्”
हैं के अंतर्गत लिखे गये विवरण का अभिप्राय यह नहीं है कि यह संसार रूपी ब्रम्ह की
रचना मात्र एक पूर्व निर्धारित किसी प्रारूप का प्रगटन है । समय जो कि संसार और इस
संसार की प्रत्येक गति का नियंत्रक होता है, उसकी स्वयं की उत्पत्ति ब्रम्ह से है । इस प्रकार इस संसार का
प्राणी जब समय का अवलोकन करता है तो उसे दीखता है “विगत”, “वर्तमान”, और “भविष्य” जबकि ब्रम्ह जब समय को
देखता है तो उसे जो दीखता है केवल एक “वर्तमान”। ब्रम्ह के “वर्तमान” में सभी कर्म
किसी प्रयोजन से हैं जिसे वह प्रकृति के माध्यम से व्यक्त करता है । ऐसी स्थिति
में जब व्यक्ति प्रकृति द्वारा प्रस्तुत किये गये कर्म को न स्वीकार कर उलटे अपनी
इच्छा और मनोवेगों द्वारा कर्म करना चाहता है, तो वह निषिद्ध है,
अधर्म है, और अर्जुन हठात् यही करने को उद्यत
था ।
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