श्रीमद्भागवद्गीता के ग्रंथकार ने
उपरोक्त अभिव्यक्ति में (1)“अक्षरम्” शब्द का प्रयोग किया है
जोकि व्यक्त करता है “अविनाशी” । अर्जुन व्यक्त करता है कि सर्वोच्च - “ब्रम्ह” भी
है और वैयक्तिक ईश्वर भी है । वहही एकल अविभाज्य सत्य भी है और नियंत्रक देवता भी
है । (2) “शाश्वत्धर्मगोपत” जो कि अभिव्यक्ति है – शाश्वत्धर्म के अविनाशी रक्षक ।
परम् सत्य जो को एक अलौकिक असम्बद्ध अस्तित्व है । रूप संसार उसी की अभिव्यक्ति है
फिरभी वह इससे अछूता है ।
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