कर्म और कर्मफल यह ब्रम्ह के
मस्तिष्क से उत्पन्न नियम है । इसका संचालन सीधा ब्रम्ह ही करता है । इसके संचालन
अवधि में, पूर्व में किये गये कर्म के कर्मफल
के फलभोग हेतु वर्तमान में उपस्थित कर्म होते हैं । कर्ता व्यक्ति यदि ब्रम्ह के संविधान
के प्रति निष्ठावान है तो वह उपस्थित कर्म को अपना कर्तव्य दायित्व मान कर यथा
स्वरूप उसे करता है । इसके विपरीत अज्ञान से आच्छादित व्यक्ति उसे करें अथवा ना
करें को अपने मस्तिष्क द्वारा निर्धारित करने की चेष्टा करता है । ऐसा करने से
उसके अज्ञान की और वृद्धि होती है ।
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