शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

कर्म का विवेक

कर्म और कर्मफल यह ब्रम्ह के मस्तिष्क से उत्पन्न नियम है । इसका संचालन सीधा ब्रम्ह ही करता है । इसके संचालन अवधि में, पूर्व में किये गये कर्म के कर्मफल के फलभोग हेतु वर्तमान में उपस्थित कर्म होते हैं । कर्ता व्यक्ति यदि ब्रम्ह के संविधान के प्रति निष्ठावान है तो वह उपस्थित कर्म को अपना कर्तव्य दायित्व मान कर यथा स्वरूप उसे करता है । इसके विपरीत अज्ञान से आच्छादित व्यक्ति उसे करें अथवा ना करें को अपने मस्तिष्क द्वारा निर्धारित करने की चेष्टा करता है । ऐसा करने से उसके अज्ञान की और वृद्धि होती है । 

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