गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

अज्ञान का फल

अर्जुन की अभिव्यक्ति जैसा कि पूर्व में वर्णित चरण 12 से 15 पर्यंत जिस दशा का वृतांत व्यक्त करती है वह मनुष्य अपने अज्ञान के वशीभूत भोगता है । जीव अज्ञान के वशीभूत जिन कर्मों को करता है उन्ही कर्मों के स्वाभाविक फल के रूप में उसको अपने विनाश का सामना करना पडता है । मनुष्य के स्वयं की इच्छा की पूर्ति में किया गया कर्म निश्चय ही बंधनकारी कर्मों की परिधि में है फलत: उसका फलभोग उसकी बाध्यता है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें