अर्जुन की अभिव्यक्ति जैसा कि पूर्व
में वर्णित चरण 12 से 15 पर्यंत जिस दशा का वृतांत व्यक्त करती है वह मनुष्य अपने
अज्ञान के वशीभूत भोगता है । जीव अज्ञान के वशीभूत जिन कर्मों को करता है उन्ही
कर्मों के स्वाभाविक फल के रूप में उसको अपने विनाश का सामना करना पडता है ।
मनुष्य के स्वयं की इच्छा की पूर्ति में किया गया कर्म निश्चय ही बंधनकारी कर्मों
की परिधि में है फलत: उसका फलभोग उसकी बाध्यता है ।
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