शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

कर्म एवं कर्मफल

मनुष्य जिन कर्मों को अपनी इच्छा की पूर्ति के लिये करता है, उनके फलों को भोगना उसकी बाध्यता होती है । यह नियम स्वयं ब्रम्ह के मस्तिष्क से उत्पन्न हुआ है और इसका संचालन ब्रम्ह स्वयं ही करता है । इसलिये इसमें किसी प्रकार अथवा किसी भी परिस्थिति में अन्यथा की कोई सम्भावना नहीं हो सकती है । इसके विपरीत जो कर्म प्रकृति द्वारा प्रेरित होते हैं और उन कर्मों का सम्पादन मनुष्य ब्रम्ह की सेवा के भाव से एवं उसके प्रतिनिधि के रूप में सम्पादित करता है ऐसे कर्मों के कर्मफल से मनुष्य का कोई सम्बंध नहीं होता है । वह स्वतंत्र रहता हैं । 

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